विवादास्पद इलेक्टोरल बॉन्ड योजना: क्या, क्यों और रद्द क्यों?

15 फरवरी, 2024 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया है और इसे रद्द कर दिया है। इस योजना के तहत, कोई भी भारतीय नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की निर्दिष्ट शाखाओं से निर्धारित राशि के इलेक्टोरल बॉन्ड खरीद सकता था। इन बॉन्ड्स को गुमनाम तरीके से किसी भी पंजीकृत राजनीतिक दल को दान किया जा सकता था।

विवादास्पद इलेक्टोरल बॉन्ड योजना: क्या, क्यों और रद्द क्यों?

2017 में शुरू की गई इलेक्टोरल बॉन्ड योजना का उद्देश्य राजनीतिक पार्टियों के लिए पारदर्शी तरीके से चंदा जुटाना था। इन बॉन्ड्स को भारतीय स्टेट बैंक की विशिष्ट शाखाओं से किसी की पहचान उजागर किए बिना खरीदा जा सकता था और फिर इच्छित राजनीतिक दल को दान किया जा सकता था।

योजना के समर्थकों का तर्क था कि इससे पारदर्शिता आएगी और काले धन का उपयोग कम होगा। हालांकि, योजना की शुरूआत से ही इसकी आलोचना हुई, कई लोगों ने इसे गुप्त चंदा देने और धनशक्ति के प्रभाव को बढ़ाने वाला बताया।

योजना के तहत कैसे काम होता था?

  • इलेक्टोरल बॉन्ड्स को निर्धारित धनराशि (₹1,000, ₹10,000, ₹1,00,000, ₹10,00,000 और ₹1 करोड़) में जारी किया जाता था।
  • बैंक में एक केवाईसी-अनुपालित खाते वाला कोई भी व्यक्ति या कंपनी इन्हें खरीद सकता था।
  • बैंक को किसी के व्यक्तिगत विवरण का खुलासा करने की आवश्यकता नहीं थी।
  • बॉन्ड राजनीतिक दलों को दान दिए जा सकते थे।
  • पार्टी को केवल बॉन्ड की राशि प्राप्त होती थी, दाता की कोई जानकारी नहीं मिलती थी।

योजना की आलोचना के प्रमुख बिंदु:

  • गोपनीयता: मुख्य चिंता दाताओं की गुमनामी थी, जिससे यह पता लगाना मुश्किल हो जाता था कि धन कहाँ से आ रहा है और कौन दल को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।
  • काला धन: यह तर्क दिया गया कि गुमनामी के कारण योजना काले धन को वैध बनाने का एक तरीका बन सकती है।
  • असमान खेल मैदान: आलोचकों का कहना था कि योजना बड़े उद्योगपतियों को अनुचित लाभ देती है, जिससे चुनाव असमान हो जाते हैं।
  • सूचना का अधिकार का उल्लंघन: चूंकि दाताओं की जानकारी छिपी रहती थी, यह माना गया कि यह सूचना के अधिकार का उल्लंघन करता है।

सर्वोच्च न्यायालय का फैसला:

15 फरवरी, 2024 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया और इसे रद्द कर दिया। अदालत ने गोपनीयता को सूचना के अधिकार का उल्लंघन और चुनावों में पारदर्शिता के खिलाफ पाया।

अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, राजनीतिक फंडिंग में सुधार के लिए एक नई व्यवस्था की आवश्यकता है। सरकार और निर्वाचन आयोग को ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है जो पारदर्शी हो और भ्रष्टाचार को रोके।

निष्कर्ष: इलेक्टोरल बॉन्ड योजना, हालांकि पारदर्शिता बढ़ाने के इरादे से शुरू की गई थी, इसकी गोपनीयता की प्रकृति के कारण विवादों का विषय बनी रही। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले ने इस योजना को खत्म कर दिया है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के वित्तपोषण में सुधार की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए।

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