भारत सरकार ने मनरेगा (MGNREGA) को बदलकर अब ‘विकसित भारत-जी राम जी’ (VB-G RAM G) बिल 2025 पेश किया है। इसमें 125 दिन का गारंटीड रोजगार, साप्ताहिक वेतन और खेती के सीजन में 60 दिनों के ‘पॉज’ जैसे बड़े बदलाव किए गए हैं। इस विस्तृत लेख में जानें कि यह नया कानून ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था और आपके अधिकारों को कैसे प्रभावित करेगा।
भारतीय ग्रामीण परिदृश्य एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। पिछले दो दशकों से ग्रामीण रोजगार की रीढ़ रही ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ (मनरेगा) अब एक नए और आधुनिक स्वरूप में ढलने जा रही है। दिसंबर 2025 में संसद के पटल पर रखे गए ‘विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी ‘VB-G RAM G’ विधेयक ने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि देश के करोड़ों ग्रामीण परिवारों के मन में भी कई सवाल पैदा कर दिए हैं। यह विधेयक केवल एक नाम परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह भारत के ग्रामीण श्रम बाजार, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों और बुनियादी ढांचे के निर्माण की रणनीति में एक बुनियादी बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है।
ग्रामीण भारत की आत्मा उसके खेतों और पंचायतों में बसती है। 2005 में जब मनरेगा लागू हुआ था, तब ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हालात आज से काफी अलग थे। उस समय इंटरनेट की पहुंच नगण्य थी, बैंकिंग सेवाएं सीमित थीं और ग्रामीण पलायन एक विकराल समस्या थी। सरकार का तर्क है कि पिछले 20 वर्षों में ग्रामीण आय में वृद्धि हुई है, कनेक्टिविटी बढ़ी है और डिजिटलीकरण ने दूर-दराज के गांवों तक अपनी पहुंच बना ली है। ऐसे में एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की गई जो केवल ‘गड्ढे खोदने और भरने’ तक सीमित न रहकर, ‘विकसित भारत 2047’ के विजन के साथ तालमेल बिठा सके।
विकसित भारत-जी राम जी (VB-G RAM G) बिल क्या है?
सरल शब्दों में कहें तो यह विधेयक 2005 के मनरेगा कानून को पूरी तरह से निरस्त कर उसकी जगह एक नया वैधानिक ढांचा स्थापित करता है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को साल में 125 दिनों के अकुशल शारीरिक श्रम की कानूनी गारंटी देना है। विधेयक का आधिकारिक नाम ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ रखा गया है, जिसे संक्षेप में ‘जी राम जी’ (G RAM G) कहा जा रहा है।
यह नया कानून रोजगार को केवल एक ‘सुरक्षा जाल’ (Safety Net) के रूप में नहीं देखता, बल्कि इसे ग्रामीण उत्पादकता बढ़ाने के एक ‘मिशन’ के रूप में परिभाषित करता है। जहाँ मनरेगा मुख्य रूप से मांग-आधारित था, वहीं नया विधेयक इसे नियोजित विकास और टिकाऊ परिसंपत्ति निर्माण के साथ जोड़ता है।
| मुख्य तुलनात्मक बिंदु | मनरेगा (2005) | विकसित भारत-जी राम जी (2025) |
| गारंटीड कार्य दिवस | प्रति वर्ष न्यूनतम 100 दिन | प्रति वर्ष न्यूनतम 125 दिन |
| वेतन भुगतान अवधि | 15 दिनों के भीतर | साप्ताहिक आधार पर या अधिकतम 14 दिन |
| फंडिंग संरचना (मजदूरी) | 100% केंद्र सरकार द्वारा | 60:40 अनुपात (केंद्र और सामान्य राज्य) |
| कृषि सीजन प्रावधान | कोई विशेष रोक नहीं | 60 दिनों का वैधानिक ‘पॉज’ (Pause) |
| निगरानी तकनीक | बुनियादी जियो-टैगिंग | AI, GPS और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण |
रोजगार के दिनों में वृद्धि: 100 से 125 का सफर
VB-G RAM G विधेयक का सबसे आकर्षक पहलू रोजगार के गारंटीड दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 करना है। यह 25% की वृद्धि ग्रामीण परिवारों की वार्षिक आय सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि अतिरिक्त 25 दिन न केवल मजदूरों की जेब में अधिक पैसा डालेंगे, बल्कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग की क्षमता भी बढ़ेगी, जो अंततः ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करेगी।
हालांकि, इस वृद्धि के पीछे कुछ बारीक पेच भी हैं। मनरेगा के तहत 100 दिन एक ‘न्यूनतम गारंटी’ थी, जिसे राज्य अपनी मर्जी से (अपने फंड का उपयोग करके) बढ़ा सकते थे, या सूखा और आपदा जैसी स्थितियों में केंद्र अतिरिक्त 50 दिन प्रदान करता था। नए विधेयक में 125 दिन को एक मानक वैधानिक पात्रता (Statutory Entitlement) बना दिया गया है। इसका अर्थ है कि अब राज्यों को अपनी योजनाएं इस प्रकार बनानी होंगी कि वे हर इच्छुक परिवार को 125 दिन का काम दे सकें।
वित्तीय वास्तुकला में बदलाव: केंद्र-राज्य साझेदारी का नया युग
VB-G RAM G विधेयक का सबसे विवादास्पद और महत्वपूर्ण बदलाव इसकी फंडिंग संरचना में है। मनरेगा के दौर में, अकुशल मजदूरी (Unskilled Wages) का पूरा 100% बोझ केंद्र सरकार उठाती थी, जबकि सामग्री (Material) लागत का 25% राज्यों को देना होता था। नए विधेयक के तहत, यह पूरी तरह से एक ‘केंद्र प्रायोजित योजना’ (Centrally Sponsored Scheme) बन गई है, जहाँ राज्यों को मजदूरी में भी हिस्सा देना होगा।
नया फंड शेयरिंग अनुपात
विधेयक के अनुसार, वित्तीय उत्तरदायित्व को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
- सामान्य राज्य और केंद्रशासित प्रदेश (विधायिका वाले): यहाँ केंद्र और राज्य के बीच 60:40 का अनुपात होगा। यानी 60% पैसा केंद्र देगा और 40% राज्य को वहन करना होगा।
- पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्य: इन क्षेत्रों की विशेष भौगोलिक और आर्थिक स्थितियों को देखते हुए यहाँ 90:10 का अनुपात रखा गया है।
- बिना विधायिका वाले केंद्रशासित प्रदेश: यहाँ का पूरा 100% खर्च केंद्र सरकार ही उठाएगी।
यह बदलाव राज्यों पर एक भारी वित्तीय बोझ डालता है। अनुमान लगाया गया है कि इस नई व्यवस्था के तहत वार्षिक कुल खर्च लगभग 1.51 लाख करोड़ रुपये होगा, जिसमें राज्यों की हिस्सेदारी भी शामिल है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य, जो पहले से ही केंद्रीय निधि के वितरण को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, के लिए यह 40% की हिस्सेदारी जुटाना एक बड़ी चुनौती हो सकती है।
मानक आवंटन (Normative Allocation) का सिद्धांत
एक और तकनीकी लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव ‘लेबर बजट’ से हटकर ‘मानक आवंटन’ (Normative Allocation) की ओर जाना है। मनरेगा में फंडिंग मांग-आधारित (Demand-driven) थी—जितनी ज्यादा मांग, उतना ज्यादा फंड। लेकिन VB-G RAM G के तहत, केंद्र सरकार वस्तुनिष्ठ मानदंडों के आधार पर हर राज्य के लिए एक ‘निश्चित बजट’ तय करेगी।
यदि किसी राज्य में रोजगार की मांग इस आवंटित राशि से अधिक हो जाती है, तो अतिरिक्त खर्च की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रावधान केंद्र के राजकोषीय जोखिम को तो कम करता है, लेकिन संकट के समय (जैसे सूखे के दौरान) गरीब राज्यों की क्षमता पर सवालिया निशान लगाता है।
कृषि और रोजगार का संतुलन: 60 दिनों का ‘पॉज’
विधेयक में एक अनूठा प्रावधान जोड़ा गया है जिसे ‘एग्रीकल्चरल पॉज’ (Agricultural Pause) कहा जा रहा है। इसके तहत, राज्य सरकारों को यह अधिकार होगा कि वे फसल की बुवाई (Sowing) और कटाई (Harvesting) के पीक सीजन के दौरान वर्ष में कुल 60 दिनों के लिए इस योजना के तहत काम रोक सकें।
इस प्रावधान के पीछे का तर्क
किसानों की एक पुरानी शिकायत रही है कि मनरेगा के कार्यों के कारण खेती के सीजन में मजदूर नहीं मिलते, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है और उत्पादन पर असर पड़ता है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार ने यह ‘पॉज’ प्रस्तावित किया है ताकि:
- खेती के लिए पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध रहें।
- कृषि उत्पादकता में कमी न आए।
- ग्रामीण श्रम बाजार में मजदूरी की दरों में अचानक होने वाली वृद्धि पर नियंत्रण रहे।
हालांकि, श्रमिकों के लिए इसका मतलब यह है कि उन्हें अब 365 दिनों के बजाय केवल 305 दिनों (365 – 60) के भीतर ही अपना 125 दिनों का रोजगार पूरा करना होगा। इससे काम पाने की खिड़की छोटी हो जाती है, जो कि छोटे और भूमिहीन मजदूरों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
चार प्राथमिक वर्टिकल: क्या काम किया जाएगा?
VB-G RAM G के तहत होने वाले कार्यों को अब अधिक वैज्ञानिक और व्यवस्थित तरीके से विभाजित किया गया है। योजना के तहत बनने वाली संपत्तियों को ‘विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक’ (National Rural Infrastructure Stack) के रूप में एकीकृत किया जाएगा। कार्यों को चार प्रमुख श्रेणियों में बांटा गया है:
- जल सुरक्षा (Water Security): इसमें तालाबों का निर्माण, चेक डैम, जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और सिंचाई नहरों की मरम्मत जैसे कार्य शामिल हैं। इसका उद्देश्य कृषि के लिए पानी की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
- मुख्य ग्रामीण बुनियादी ढांचा (Core Rural Infrastructure): इसमें गांवों को जोड़ने वाली सड़कें, पुल, पंचायत भवन और आंगनवाड़ी केंद्रों का निर्माण शामिल है।
- आजीविका संबंधी बुनियादी ढांचा (Livelihood-related Infrastructure): यह श्रेणी नई है और बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें अनाज के भंडारण के लिए गोदाम (Storage), ग्रामीण हाट (Markets) और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के लिए कार्यस्थलों का निर्माण किया जाएगा।
- आपदा प्रबंधन और जलवायु लचीलापन (Extreme Weather Mitigation): बाढ़ नियंत्रण प्रणाली, तटीय सुरक्षा और चरम मौसम की घटनाओं से निपटने के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे का विकास इस वर्टिकल का हिस्सा है।
इन कार्यों की योजना ‘विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं’ (Viksit Gram Panchayat Plans) के माध्यम से स्थानीय स्तर पर बनाई जाएगी और फिर इन्हें जिला और राज्य स्तर पर समेकित किया जाएगा।
वेतन भुगतान और बेरोजगारी भत्ता
मजदूरी के मामले में नया बिल श्रमिकों को तेजी से नकद राशि उपलब्ध कराने का वादा करता है। मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक आधार पर या काम पूरा होने के अधिकतम 14-15 दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा। मजदूरी की दरें केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित की जाएंगी, जो मनरेगा की मौजूदा दरों से कम नहीं होंगी।
बेरोजगारी भत्ता (Unemployment Allowance)
यदि कोई श्रमिक काम मांगता है और उसे 15 दिनों के भीतर रोजगार नहीं दिया जाता है, तो वह बेरोजगारी भत्ते का हकदार होगा। इस भत्ते के भुगतान की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। बेरोजगारी भत्ते की गणना के लिए निम्नलिखित गणितीय आधार का उपयोग किया जा सकता है:
यदि W दैनिक मजदूरी है, तो:
- प्रथम 30 दिनों के लिए भत्ता = ¼ × W
- 30 दिनों के बाद भत्ता = ½ × W
यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि ‘काम का अधिकार’ केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि राज्यों पर समय पर रोजगार देने का दबाव बना रहे।
तकनीक और शासन: भ्रष्टाचार पर ‘डिजिटल’ प्रहार
VB-G RAM G विधेयक पारदर्शिता के लिए अत्याधुनिक तकनीकों के उपयोग को अनिवार्य बनाता है। मनरेगा में अक्सर ‘घोस्ट वर्कर्स’ (फर्जी मजदूर) और मस्टर रोल में हेरफेर की शिकायतें आती थीं, जिनसे निपटने के लिए नए बिल में निम्नलिखित प्रावधान हैं:
- AI-आधारित ऑडिट: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके व्यय और भौतिक प्रगति के बीच विसंगतियों की पहचान की जाएगी।
- GPS निगरानी: सभी कार्यस्थलों की निगरानी जीपीएस और मोबाइल आधारित ऐप के माध्यम से की जाएगी, जिससे काम की वास्तविक स्थिति का पता चल सके।
- बायोमेट्रिक उपस्थिति: चेहरे या अंगूठे के निशान के आधार पर उपस्थिति अनिवार्य होगी ताकि केवल वास्तविक श्रमिक ही लाभ उठा सकें।
- साप्ताहिक सार्वजनिक खुलासा: हर ग्राम पंचायत को हर हफ्ते कामों की स्थिति, भुगतान और मस्टर रोल की जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करनी होगी।
ये उपाय जवाबदेही तो बढ़ाते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में खराब इंटरनेट और तकनीकी साक्षरता की कमी के कारण इनके कार्यान्वयन में चुनौतियां भी आ सकती हैं।
ग्रामीण कृषि बाजार (GrAMs): छोटे किसानों के लिए नई उम्मीद
VB-G RAM G बिल का एक बड़ा हिस्सा ‘ग्रामीण कृषि बाजार’ (GrAMs) के विकास से जुड़ा है। भारत में लगभग 22,000 ग्रामीण हाट हैं जहाँ छोटे किसान अपनी उपज बेचते हैं। इन हाटों में अक्सर बिजली, पानी और भंडारण जैसी सुविधाओं का अभाव होता है।
GrAMs पहल के तहत, इन हाटों को आधुनिक बाजारों में बदला जा रहा है। इसके लिए ‘कृषि-बाजार बुनियादी ढांचा कोष’ (AMIF) के तहत 2,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
GrAMs के फायदे और संरचना
| सुविधा | विवरण |
| भौतिक बुनियादी ढांचा | पक्की फर्श, चारदीवारी, शौचालय और बिजली की व्यवस्था। |
| विपणन सेवाएं | ग्रेडिंग, छंटाई और इलेक्ट्रॉनिक वजन कांटे। |
| डिजिटल लिंकेज | इन बाजारों को e-NAM (राष्ट्रीय कृषि बाजार) पोर्टल से जोड़ा जाएगा। |
| सीधी बिक्री | बिचौलियों को हटाकर किसानों को उपभोक्ताओं से सीधे जोड़ना। |
GrAMs का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसान को अपनी उपज बेचने के लिए 50 किमी दूर APMC मंडी न जाना पड़े, बल्कि उसे 4-5 किमी के दायरे में ही सही कीमत मिल सके। यह पहल VB-G RAM G के ‘आजीविका बुनियादी ढांचा’ वर्टिकल के साथ मिलकर काम करेगी।
राजनीतिक घमासान: ‘नाम’ और ‘निजाम’ पर विवाद
जैसे ही विधेयक संसद में आया, विपक्ष ने इसके नाम से ‘महात्मा गांधी’ को हटाए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने इसे बापू का अपमान बताया, जबकि सरकार का कहना है कि यह विधेयक गांधीजी के ‘ग्राम स्वराज’ और ‘राम राज्य’ के स्वप्न को हकीकत में बदलने का एक प्रयास है।
विपक्ष की चिंताएं केवल नाम तक सीमित नहीं हैं:
- संघवाद (Federalism) पर चोट: राज्यों का तर्क है कि मजदूरी में 40% की हिस्सेदारी मांगना उनके सीमित वित्तीय संसाधनों पर हमला है।
- काम के अधिकार का कमजोर होना: आलोचकों का मानना है कि ‘मानक आवंटन’ (Normative Allocation) के कारण केंद्र के पास यह शक्ति आ जाएगी कि वह तय करे कि किस राज्य को कितना काम देना है, जिससे योजना का ‘अधिकार-आधारित’ स्वरूप खत्म हो सकता है।
- निजी डेटा की सुरक्षा: बायोमेट्रिक और जीपीएस डेटा के अनिवार्य उपयोग से श्रमिकों की निजता पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
निष्कर्ष: 2047 की ओर एक कदम
VB-G RAM G विधेयक 2025 केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि भारत अपनी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को किस दिशा में ले जाना चाहता है। 125 दिनों का रोजगार और आधुनिक बुनियादी ढांचे का निर्माण एक उज्ज्वल भविष्य की ओर इशारा करता है। हालांकि, राज्यों की वित्तीय भागीदारी और तकनीकी बाधाएं इस मिशन के मार्ग में रोड़े अटका सकती हैं।
एक सजग नागरिक और जागरूक पाठक के नाते, हमें यह समझना चाहिए कि ग्रामीण भारत की समृद्धि केवल मजदूरी देने में नहीं, बल्कि स्थायी आजीविका और आधुनिक बाजारों के निर्माण में निहित है। ‘जी राम जी’ बिल इसी संतुलन को साधने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास है।









